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(पूर्वोत्तर परिषद का उद्घाटन करते हुए भाषण, शिलंग, 7 नवम्बर 1972)

इससे पूर्व इस वर्ष मुझे मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा तथा केन्द्र शासित प्रदेशों-मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के स्थापना दिवसों के उपलक्ष्य में विशेष समारोहों में भाग लेने का मौका मिला था। आज मुझे इस परिषद का उद्घाटन करते हुए प्रसन्नता है जिसके अंतर्गत उपर्युक्त प्रदेशों और असम तथा नगालैंड को शामिल किया गया है।

मुझे पार्वत्य तथा जनजातीय लोगों में हमेशा दिलचस्पी रही है और पूर्वोत्तर भारत में मेरी विशेष रुचि है क्योंकि यहां प्राकृतिक सौंदर्य है, विविधताएं हैं और जटिल चुनौतियां हैं। मुझे असम से सहानुभूति है जो सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध है लेकिन अन्य राज्यों की तुलना में, अवसरों के अभाव के कारण, आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। इस अंचल की अन्य राजनैतिक इकाइयां भी इन्हीं कारणों से इसी प्रकार पिछड़ी हुई हैं। परन्तु यह बात केवल इसी अंचल में नहीं पाई जाती। देश के अन्य बड़े-बड़े हिस्से भी, जिनमें मेरे अपने राज्य उत्तर प्रदेश का पर्वतीय भाग और पूर्वी जिले शामिल हैं, आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के लिहाज से ही नहीं, सामरिक महत्व की दृष्टि से भी पूर्वोत्तर क्षेत्र की बड़ी अहमियत है। इस क्षेत्र की मजबूती और विकास का पूरे देश के लिये बहुत ज्यादा महत्व है।

इस क्षेत्र के विभिन्न राजनैतिक हिस्से अनेक समान बातों के कारण एक-दूसरे से जुड़े हैं। यहां के निवासियों की रंगबिरंगी वेश-भूषा और रीति-रिवाज लासानी हैं। उन्हें अगर एक ओर हरे-भरे वातावरण में रहने का सौभाग्य मिला है तो दूसरी ओर घनघोर वर्षा, बाढ़ और भू-स्खलनों के संकट का सामना भी करना होता है। यहां की भौगोलिक बनावट ही ऐसी है कि आवागमन और संचार सम्बंधी दुर्लध्य कठिनाइयां पैदा होती हैं। एक जगह को दूसरी से जोड़ने और पूरे अंचल को लाभ पहुंचाने के लिए सड़कों और पुलों की जरूरत है। नदियों के पानी का सबके लाभ के लिए उपयोग किया जाना है। यहां की धरती में पाई जाने वाली वन तथा भू-गर्भ सम्पदा को भी सबके फायदे के लिए काम में लाना है।

परिषद का प्रमुख कार्य लोगों की भलाई के लिए इस क्षेत्र का विकास करना है। विकास का पहला सूत्र है समन्वित कार्य-प्रणाली। मुझे कोई संदेह नहीं कि ऐसी कार्य प्रणाली से यहां की विभिन्न इकाइयों को फायदा पहुंचेगा। आजकल प्रभुसत्ता सम्पन्न देश भी व्यापार, सिंचाई और बिजली के लिए नदी प्रणालियों और जल संसाधनों के उपयोग, राजमार्गों और रेलमार्गों के निर्माण तथा खनिज सम्पदा के उपयोग जैसे मामलों में सहयोग का सहारा लेती है। और इस प्रकार के सहयोग से अलग-अलग सरकारों के अपने अधिकारों पर कोई आंच नहीं आती।

पूर्वोत्तर परिषद की यह पहली बैठक है। इस अवसर का लाभ उठाते हुए मै परिषद के विचाराधीन विषयों और कार्य प्रणाली के बारे में कुछ गलतफहमियां दूर करना चाहूंगी। यह इस क्षेत्र की विभिन्न राजनैतिक इकाइयों का संगठन है जिसकी स्थापना संसद में पारित एक अधिनियम के अंतर्गत की गई है और जिसका उद्देश्य विकास और कल्याण की योजनाएं तैयार करना है। यह किसी सरकार से ऊपर के स्तर पर काम करने वाला कोई सरकारी तंत्र नहीं है।

इससे राज्यों या केन्द्र शासित प्रदेशों के अधिकारों में किसी भी रूप में कोई कमी नहीं होती। यह सलाह देने वाला संगठन है, देख-रेख रखने वाला नहीं। इससे इसके सदस्य राज्यों और प्रदेशों के केन्द्र के साथ सम्बंधों में भी कोई परिवर्तन नहीं होता। केन्द्र सरकार इसका इस्तेमाल इस क्षेत्र के विभिन्न प्रशासनों के अधिकारों या कार्य-प्रणाली में दखल देने के लिए नहीं करेगी। राज्यपाल श्री बी.के. नेहरू की तथा मेरी भी यह आशा है कि परिषद समय के साथ-साथ एक प्रभावशाली, समन्वयकारी अभिकरण बनेगी तथा सद्भाव, जिम्मेवारी और पारस्परिक सम्मान के वातावरण में क्षेत्रीय समस्याओं को हल कर सकेगी।

मैं चाहूंगी कि परिषद ऐसी परियोजनाएं तैयार करे जिनका लाभ एक से ज्यादा इकाइयों को मिले और जिन्हें चौथी पंचवर्षीय योजना के शेष समय में पूरा था, कम से कम आरम्भ किया जा सके। ऐसे अनेक कार्य-क्षेत्र हैं, जैसे परिवहन और संचार, बिजली, बाजार बिक्री, संस्थागत वित्त प्रशिक्षण, उद्योगों के लिए व्यावहारिकता रिपार्ट तैयार करना आदि, जिनके संदर्भ में क्षेत्रीय दृष्टिकोण बहुत अधिक लाभदायक सिद्ध होगा। दूरदर्शिता और व्यावहारिकता किसी भी श्रेष्ठ आयोजन की दो मूल कसौटिया हैं। मैं आपको आश्वासन देना चाहूंगी कि परिषद जो भी सुझाव देती है और जो भी परियोजनाएं तैयार करती है उन पर योजना आयोग तथा भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय विशेष ध्यान देंगे।

आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि भारत सरकार परिषद द्वारा तैयार की गई परियोजनाओं के लिए चौथी योजना के शेष समय में खर्च के निमित्त परिषद को 50 करोड़ रुपये देगी। यह धनराशि उस रकम के अतिरिक्त होगी जो यहां के राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को उनकी अपनी योजनाओं के लिए मिलेगी।

इस विशिष्ट क्षेत्र के विकास के लिए इस प्रकार का आवंटन पांचवीं पंचवर्षीय योजनाओं में भी जारी रहेगा। हम इन दिनों पांचवीं योजना की रूपरेखा पर विचार कर रहे हैं। अभी धनराशियों के आवंटन को अंतिम रूप नहीं दिया गया है। न केन्द्रीय क्षेत्र में, न राज्यों के लिए। जब तक यह विचार-विमर्श पूरा न हो जाए तब तक स्पष्ट है कि यह बताना सम्भव नहीं होगा कि पांचवीं योजना के लिए कितने धन का प्रावधान होगा। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाती हूं कि अगर इस क्षेत्र के लाभ के लिए योजना के अंतर्गत कोई प्रस्ताव किया गया तो उसके लिए धन की कमी आड़े नहीं आएगी।

ऐसी परियोजनाओं एवं कार्यक्रमों को लागू करने का दायित्व सम्बद्ध सरकारों और उनके अभिकरणों का होगा। इससे उनकी वर्तमान प्रशासनिक और कार्यपालक क्षमता को और मजबूत करने की आवश्यकता हो सकती है। यह महत्वपूर्ण है कि पूर्वोत्तर राज्यों में से प्रत्येक आंकड़ा संकलन, परियोजना- निर्धारण, सामान्य निर्माण तथा प्रशासन के क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता बढ़ाए।

इस वर्ष राष्ट्र ने अपनी स्वाधीनता की द्वितीय चतुष्पदी में प्रवेश किया है। देश के बहुत से भाग ऐसे हैं जो महसूस करते हैं कि गत 25 वर्षों की अवधि में उनकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। हमारा प्रयास ऐसा होना चाहिए कि उनके मन से उपेक्षा का यह भाव हटे। लेकिन जिन हिस्सों को विकसित माना जाता है वे भी, अगर उनके विकास को विकसित देशों के पैमाने से नापा जाए, या अगर हमारी आशाओं के अनुकूल दृष्टि से परखा जाए तो, वास्तव में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हैं। प्रत्येक राज्य में कहीं न कहीं घोर कष्ट और गरीबी में दिन गुजारने वाले लोग पाए जाते हैं। जब हम समाजवादी ढंग के विकास की बात करते हैं तो हमारा उद्देश्य कुल मिलाकर केवल गरीबी हटाना ही नहीं होता, बल्कि वर्ग-गत और क्षेत्रों के बीच की असमानताएं दूर करना होता है। आर्थिक विकास की प्रक्रिया से अक्सर क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ जाया करती हैं। इसका कारण यह होता है कि जिन स्थानों में विकास के लिए अनुकूल साधन, जैसे ऊर्जा, संचार और प्रशिक्षित जनशक्ति मौजूद है वहां विकास की रफ्तार अधिक तेज होती है। हम कोशिश कर रहे हैं कि अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे साधन निर्मित हो। लेकिन विकास उपहार के रूप में नहीं उपलब्ध हो सकता। वह केवल धन के आवंटन से भी सम्भव नहीं होता। विकास के लिए जरूरत होती है दृढ़ संकल्प और कठोर परिश्रम की ।

हम आज अपने यहां जो अनेक तरह के तनाव पाते हैं उनका कारण सीमित साधनों और रोजगार के सीमित अवसरों के लिए तीव्र होड़ है। दोनों एक-दूसरे को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। लेकिन अगर हम रोजगार के और अवसर उत्पन्न कर सके- केवल वैतनिक रोजगार ही नहीं बल्कि स्व-रोजगार के भी तो तनाव में कमी आ सकती है। संकीर्ण क्षेत्रवाद और भाषायी विद्वेष का दीर्घकालीन समाधान संतुलित विकास के जरिए ही हो सकता है। तथाकथित शिक्षित व्यक्ति भी साम्प्रदायिक और भाषायी भावनाओं के असर से तार्किक चिन्तन का परित्याग कर देते हैं और अक्सर उस सम्पत्ति को नष्ट करने लगते हैं जो कुल मिलाकर सम्पूर्ण राष्ट्र की है। अधिक साधनों से ही कल्याण का मार्ग नहीं खुल जाता में देश के विभिन्न भागों और विशेषतः असम के उन नौजवानों से जो इस समय भावनाओं में बह रहे हैं, अपील करूंगी कि वे शांति से सोचें और काम करें। कुछ दिन पूर्व मैं संसद में विपक्षी दलों के नेताओं से मिली थी। वे सभी सहमत थे कि हमें असम में सामान्य वातावरण बनाने के लिए काम करना चाहिए और शांतिपूर्ण विचार-विमर्श के द्वारा राज्य की वास्तविक कठिनाइयों को दूर करना चाहिए।

मुझे इस परिषद का उद्घाटन करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है। यह क्षेत्रीय आयोजन का एक ऐसा नया अध्याय है जिसकी बड़ी सम्भावनाएं हैं। मेरी कामना है कि हमने इससे जो आशाएं लगा रखी हैं वे पूरी हो। मैं यह भी चाहती हूं कि इस प्रयोग को सफल बनाने के लिए आप सब, जो इस क्षेत्र में रहते हैं, अपना पूरा सहयोग दें।

एक न्यायप्रिय समाज में कुछ लोगों के अधिकारों को अन्य लोगों के अधिकारों पर हावी नहीं होना चाहिए। भारत में हम सब राष्ट्र के पुनर्निमाण के महान कार्य में संलग्न हैं और अपने इतिहास को एक नई दिशा देना चाह रहे हैं। इसमें सभी क्षेत्रों की जनता सहभागी है। आइए, हम सब वृहत्तर हित के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दें।


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